मेरा अंतःकरण कहाँ है?
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि क्या इतिहास केवल उन्हीं लोगों को याद रखता है जो जीत गए, या फिर वह चुपचाप उन लोगों को भी याद रखता है जिन्होंने तब खड़े होने का साहस दिखाया, जब बाकी सब मौन थे। पिछले कुछ दिनों से एक प्रश्न मेरे हृदय का पीछा नहीं छोड़ रहा है— हम कहाँ हैं? एक ईसाई के रूप में नहीं। एक जेसुइट के रूप में नहीं। किसी धर्म विशेष के सदस्य के रूप में भी नहीं। बल्कि एक मनुष्य के रूप में। जहाँ भी मेरी नज़र जाती है, मैं लोगों को अपने-अपने बोझ उठाते हुए देखता हूँ। कोई शोक में है, कोई भूखा है, कोई अपने भविष्य को लेकर भयभीत है, और कोई ऐसा है जिसकी आवाज़ कोई सुनना ही नहीं चाहता। चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान हो, सिख हो, ईसाई हो, बौद्ध हो या किसी भी धर्म से न जुड़ा हो—उसका दुःख सबसे पहले मानवीय है, उसके बाद वह किसी पहचान का हिस्सा बनता है। और मैं स्वयं से बार-बार पूछता हूँ— ऐसे समय में मेरा विश्वास मुझसे क्या अपेक्षा करता है? डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने हमें याद दिलाया था कि अधिकार तभी तक सुरक्षित रहते हैं, जब तक लोग न्याय की रक्षा करने का साहस रखते हैं। उन्होंने केवल नारे नहीं दिए, बल्कि एक ...